Monday, November 16, 2009

इस कदर मैं खो गया, शहर के जंजाल में,
टूट कर सिमट गयी ,ज़िंदगी इस जाल में .
 
खोज में रोटी के मैं, चला था तेज़ चाल में,
सोचकर, कुछ तो मिलेगा शहर के उस ताल में.
 
रखके पत्थर पेट पर, फूटपाथ पे लेटकर ,
रोज ढूँढी नौकरी ,फैक्ट्री के गेट पर .
 
ढूँढता में रह गया, भीड़ में ही ढह गया ,
लाख कोशिशों के बाद ,भी ना हो सका आबाद .
 
भूख मरी के मार ने, शहर की सरकार ने,
धर दबोचा तब गला, जब मेरा मुर्दा जला .
 
विश्वरूप , नवम्बर १७ ,२००९   

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